"देख के भी नही देखते"
अपने डेढ़ साल के बच्चे का पकड़ के यूँ ही बहार निकली तो एक गुब्बारे वाले को देखा उसे देख के मेरा बेटा रुक गया, मैंने उसे बड़ा सा गुब्बारा ले कर दे दिया और उसके चेहरे पर मासूम सी मुस्कान तैर गयी जिसे देख के मुझे बहुत सुकून मिला .... हमेशा की तरह ...
पलटी तो देखा की चार - पांच छोटे बच्चे खड़े थे, उनके शारीर पे पूरे कपडे भी नही थे ...और वो बड़ी ही हसरत भरी निगाहों से उन्हें देख रहे थे, जैसे की गुब्बारे न हो हो कर आसमां में खिले हुए फूल हों, जिनका उन्हें मिल पाना असंभव हो ... वे सारे ललचाई निगाहों से उन्हें देख कर आपस में कुछ फुसफुसा भी रहे थे... और बीच बीच में गुब्बारे वाले से दबी जबान मांग भी रहे थे....
पर गुब्बारे वाला तो ऐसे बर्ताव कर रहा था जैसे वहां कोई है ही नही...
वो सिर्फ अमीर औरतों क साथ आये बच्चो को अपने गुब्बारे दिखा रहा था ताकि वो उन्हें खरीद लें... शायद उसे भी उन बच्चों को देख कर अपने बच्चों की याद आई होगी जिनके लिए घर जाते वक़्त उसे भी कुछ ले कर जाना होगा....
मैंने अपना पर्स खोल कर देखा तो उसमे सिर्फ दस दस के दो नोट पड़े हुए थे और एक पांच सो का जिसे पहले ही वो छुट्टा करने से मना कर चूका था.. मैंने दो गुब्बारे और ख़रीदे और उन बच्चों को पकड़ा दिए... तो उन्हे लगा जैसे उनके आसमां के टूट कर उनके पास गिर गये हों.. बहुत अचरज भरी मुस्कान से मुझे देखते रहे...
मैं जैसे ही मुड़ी उनमे से एक मेरे आगे आ के खड़ा हो गया बोला... दीदी... "मुझे भी दिलाओ न...."
मैंने अपने बेटे को देखा वो बड़े प्यार से अपना गुब्बारा देख रहा था.. मैंने इशारे से उस से माँगा तो उसने उसे अपनी तरफ खींच लिया... जैसे कह रहे हो की "मैं नही दूंगा.." मैंने उसे धीरे से मांग क उस गरीब बच्चे को पकड़ा दिया... मेरा बेटा मुझे बड़ी अजीब सी निगाहों से देख रहा था... मैंने झट उसे गोद उठा लिया...
उसे ले के मुड़ चली तभी एक बछ सामने आ क बोला... "दीदी सिर्फ मुझे नही मिला ...." मैं उसे ये कह कर जल्दी से तेज क़दमों से आगे बढ़ गयी की "बेटा मेरे पास अब खुल्ले पैसे नही हैं...."
बोल के वहां से चल तो दी मैं... पर अब मुझे खुद में और उन लोगों में कोई फर्क नज़र नही आ रहा था जो "इन्हें देख के भी नही देखते थीं...!!!"